दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय । जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे को होय ॥ भावार्थ…
चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोये । दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोए ॥ भावार्थ: कबीर दास जी …
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय । जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय ।। भावार्थ: कबीर दा…
जाति न पूछो साधू की पूछ लीजिए ज्ञान । मोल करो तलवार को पडा रहन दो म्यान ॥ भावार्थ: कबीर दास जी …
पढ़ी पढ़ी के पत्थर भया लिख लिख भया जू ईंट । कहें कबीरा प्रेम की लगी न एको छींट ।। भावार्थ: ज्ञान स…
जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि है मैं नाहीं । प्रेम गली अति सांकरी जामें दो न समाहीं ।। भावार्थ: क…
तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय | कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय || भावार्थ: क…
ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोये। औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए।। भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं,…
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब । पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब ॥ भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं…
बड़ा भया तो क्या भया, जैसे पेड़ खजूर । पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर ॥ भावार्थ: कबीर दास जी…